मोहरा

हर कोई आज एक योद्धा है
बना किसी न किसी का हथियार है
लड़ने को खड़ा हमेशा तैयार है
किसी भी बात से हो जाता नाराज है
खुद भक्त तो दूसरा गद्दार है
युद्ध के लिए करता प्रयास है
किस से लड़ना है इससे अनजान है
बन गया है मोहरा किसी का
जानता तो है
पर मानने को नहीं तैयार है

युद्ध की आहट

लगता है डर
युद्ध की आहट से
तुम्हारे द्वार तक पहुंचने से पहले
मेरे घर से होकर वो जायेगा
छाती ठोकोगे तुम विजय मे
पर सीने पर गोली मेरा अपना खायेगा
वतन रहेगा सुरक्षित हमारा
घर मेरा बस तार तार हो जायेगा
युद्ध की चाह से पहले बस
इक कतरा आँसू मेरे लिये भी रख लेना
डरतें हैं इस आग में
अस्तित्व हमारा खण्डहर हो जाएगा

कारावास

 

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क्यों सीमाओं में बंधते हो
कभी जात की कभी धर्म की
क्यों बाँधा हैं खुद को
देश में कभी समाज में
जकड़ा हैं स्वयं को
कभी उम्र में कभी ओहदे में
कभी मोह में कभी ऐश्वर्य में
कभी काले में तो कभी गोरे में
कभी स्त्री में  कभी पुरुष मे
खुद ही अपने को बाँध लिया
बड़े में तो कभी छोटे मे
न होता यह सब
तो उड़ते स्वच्छंद हम भी आकाश में
बस मन का ही तो फेर था
और डर का ही तो खेल था
इक जीना ही तो था
क्या पा लिया विकास से
घरौंदे छोटे होते गये
इस गोले से बाहर तक तो निकल न सके
इक दूजे पर गोलियां चलाना और सीख गये
इतने ही काबिल थे तो जहान बनाते नये
और छोटे होते गए दायरे
कभी भाषा के तो कभी संस्कार के
मन जकडता गया
छोटे होते  में कारावास में

तकदीरें

तकदीरें बदला नही करती
वक्त के साथ भर जाता है घाव
रफ्तार जिन्दगी की रुका नही करती
लकीरें हथेली की घिस जाती हैं
नियति फिर भी पलटा नही करती
थक जाते हैं मन पाँव शरीर
मंजिले अपनी जगह से हिला नहीं करती
सूख जाते हैं सागर दरिया
सूरज की गर्मी कम हुआ नही करती
धूप ढल जाती है जीवन की मु्ंड़ेर से
परछाईं यादों की साथ छोड़ा नही करती
जिन्दगी तकदीरों से लड़ा नहीं करती
क्योंकि
तकदीरें ऐ दोस्त बदल नही करतीDSCN7098

त्यागी सीता ही जायेंगी

त्यागी क्यों हे राम
हर हाल में
सीता ही जायेंगी
परीक्षा की अग्नि में
तपकर भी
सोना न हो पायेगी
अपनों को त्यजकर
संग तुम्हारे वह आयेगी
राजसी वैभव त्याग
संग तुम्हारे वन को भी जायेंगी
त्यागी क्यों हे राम
हर हाल में , पर
सीता ही जायेंगी
चाहे तेज से अपने
मर्यादा तुम्हारी बचायेगी
जब भी लक्ष्मण की रेखा
लाँघकर सीता कोई जायेगी
नियति  यह ही हरबार
जग में दोहराई जायेगी
त्यागी हर हाल में तो
हे राम, सीता ही जायेंगी

हसरतें कभी मंज़िल न हुई

IMG_0879रातें मेरी जिंदगानी न हुई
बातें तेरी कहानी न हुई
फासलों के सिलसिले ही रहे
हसरतें कभी मंज़िल न हुई

दर्द की कद्रदानी न हुई
खुशियों की निगहबानी न हुई
लबों पे तंज़ अटके ही रहे
आँखों की हँसी से यारी न हुई

नींदो की खुमारी न हुई
सपनों की राजदारी न हुई
ख्वाब दहलीज़ पर ठिठके से रहे
सुबह की किसी को इन्तज़ारी न हुई