यादों के कारवाँ

बहुत कुछ रह गया अनकहा
बहुत कुछ छूट गया जहाँ का तहाँ
जाने वाले चले गये न जाने कहाँ
देकर हमें यादों का कारवाँ

स्त्री

हर दिन टूटती हूँ
हर दिन बिखरती हूँ
एक एक टुकड़ा समेटती हूँ हर दिन
सहेजती हूँ फिर से खड़ा करती हूँ खुद को
हर दिन
निरऩतर चलता रहता है प्रयास
जीवन बस प्रयत्न है अनन्त
एक नज़र एक शब्द से
बिखर जाता है पूरा प्रयास
मन का हर कोना हो जाता है छलनी
फिर पिरोती हूँ खुद को समय के धागों मे
स्त्री हूँ
हर दिन स्वयं को कर्मो के चक्र में
भूल जाती हूँ
उठना गिरना चलता है प्रतिदिन
हर दिन