इल्ज़ाम

आये थे झोली फैलाये
भीख प्यार की मांगने
इल्ज़ामो से यार ने
दामन ही भर दिया
ढाल  हमेशा समझते रहे
जिसको अपनी
पत्थर पहला न जाने क्यों
उसने ही उठा लिया ….

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मुक्तक

मुक्त किया तुम्हें अपने प्यार के बन्धन से
मुक्त किया तुम्हें अपने आशाओं के जंजाल से
मुक्त किया तुम्हें तुम्हारे जीवन मे
सबसे ज़रूरी होने की अपेक्षा से
मुक्त किया तुम्हें मेरे साथ खड़े
होने की जरूरत से
मुक्त किया तुम्हें मेरे मन की पीड़ा से
मुक्त किया तुम्हें मेरे संग चलने की विडम्बना से
मुक्त किया तुम्हें इन दिल की दीवारों से
उड़ो स्वच्छंद उन्मुक्त आकाश में
मुक्त किया तुम्हें वापस मेरे पास आने के इन्तज़ार से
बन्धन मे रखूँगी अपने मन को
बेडि़यों मे बांधुगी अबसे अपनी आशाओं को अपेक्षाओं को
भावनाओं को जकड़ लूंगी अब धरातल की ज़जीरों मे
हमेशा हमेशा के लिए।

कशमकश

जिन्दगी तू खेलती रही है खेल हमसे
मुझे तोड़ा, गिराया, रुलाया
मेरा लड़ना मेरे हालात से
देखती रही तू
मज़े लेती रही तू
जहाँ देखा कि
अब जायेंगे हार
ड़ाल देंगे हथियार
देकर इक छोटा सा ईनाम
तू फिर कर देती है तैयार
इक नई कशमकश के लिए …

थोड़ा और वक्त

दिल में एक ख़लिश सी है
यादों की अभी आँखों में नमी सी है
ठहर तो ए मन
लगेगा थोड़ा अभी और वक्त
रात के कटने मे
सहर होने मे अभी कमी सी है

चला चल मन

बस एक दिन और
खड़ा रख खुद को
कल शायद समय बदले
कल शायद हो ये बेहतर
बस एक दिन और
निकाल ले यह दिन, ये पल
टूटना मत, बिखरना मत
बस थोड़ा और
चला चल मन
हर पग पर रख बस निगाह
एक एक पग बढ़ाता चल बस
रास्ता दिखेगा कल
कदम दर कदम राहें होगी छोटी
कहीं तो नज़र आएगी रोशनी ….