नियति का खेल

यूँ तो तेरा प्यार
इक बहाना था
नियति का खेल
बड़ा ही निराला था
कुछ तुम्हारी मज़बूरिया थी
कुछ हमें भी फ़र्ज़ निभाना था
मंजिलों को चले तो थे साथ मगर
इन रास्तों ने हमें भटकाना था
और कुछ तो रफ्तार तुम्हारी तेज़ थी
कुछ काँटों ने भी दामन मेरा उलझाना था
यह नियति का खेल
बड़ा ही निराला था
बस तेरा प्यार
ही एक सहारा था

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मरहम

क्यों तोड़ने की बातें करते हो
क्यों नहीं मिल कर खुशियाँ मनाते
दिल की चोट मन की पीड़ा
क्यों नहीं प्यार से हर ज़ख़्म मिटाते
घावों की टीस बद्दुआ न बन जाए कहीं
इतना भी नहीं किसी को सताते
दुख देकर कभी सुख मिलता नहीं
आँसुओं से फूल हैं क्या कभी खिल पाते
मुस्कुराहटे देकर किसी को कभी
चलो आओ अपने दिल को हैं सजाते
दिल पर, कुछ तुम्हारे कुछ हमारे
आओ है मिलकर मरहम लगाते..

प्यार मेरा हार गया

प्यार मेरा हार गया
घृणा तुम्हारी जीत गई
प्यार मेरा अपमानित दरवाजे
से तुम्हारे लौट आया
घृणा तुम्हारी हर दहलीज़
पार कर दिलों में जा पनपी
प्यार मेरा कमज़ोर रहा
पल भर में कुम्हला गया
घृणा तुम्हारी सबल रही
हर पल बड़ती ही गई