अभिव्यक्ति की असहमति

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करती हूँ चित्रों को
शब्दों में व्यक्त करने का प्रयत्न
दूर मुझे आता है नज़र
अपनी खिड़की से गुलमोहर
बरसता भी है सावन
पर हूँ क्यों इन्हें
शब्दों में बाँधने मे
मै असफल
वो बादलों से घिरा
आकाश का टुकड़ा
जो दिखता है मेरे झरोखे से
क्यों मुझे और मेरे शब्दों को
हराकर चल देता है
बरसती बूँदों के शब्द भी
मेरे शब्दों से खाते नही मेल
वो गुलमोहर भर देता है मन को
नारंगी और हरी प्रसन्नता से
बरसात बादल बूँदे देते है भिगा
मन को अनजानी खुशी से
पर न जाने ये क्यों
मेरे शब्दों मेरी अभिव्यक्ति से
लगते है असहमत

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गुमान

खामोशी आ गई दरमियान
लफ्जों मे तक्कलुफ
पर दिल को तुम्हारी
ख़ामोशी से भी इत्मीनान आता है
कानों मे सरसराती है तुम्हारी हँसी
दूरियों में भी नज़दीकी का गुमान आता है

जुदा जुदा

ईश्वर मेरा क्या तेरे से जुदा होगा
तेरा खुदा क्या मेरा न खुदा होगा
ये फूल ये पत्ते ये पौधे ये पेड़
क्या सबका रचयिता जुदा जुदा होगा
ये दरिया ये सागर ये धरती ये आकाश
क्या इन सबका भी खुदा अलहदा होगा

नया युग

लक्ष्मण रेखा में बाँधा मुझे
मर्यादा मे समेटा
मेरे वेग को आवेग को
हर युग में है जकड़ा
कभी देवी कभी माता
परिभाषा मे है बाँधा
सदियों से मेरी भावनाओं की
अथाह गहराई को तुमने
बस झलक भर है देखा
विचलित हुए भयभीत हुए
पर रूप को पूरा मेरे
तुमने अभी है कहाँ जाना
मेरे प्यार को विश्वास को
कमजोरी मेरी माना
मेरे समर्पण की शक्ति
को तुमने कहाँ है समझा
तुम तो विजेता रहे
खुद को हार कर जीना
तुमने कहाँ है जाना
जाओगे जब सीख
रक्षक बनने की कला
साहस, वीरता बन जायेगा
स्त्रीत्व लिए पुरुष तब
नया युग बनायेगा ….

बिझड़ने से ही लोग
जुदा नही होते
पास होकर भी ऐ दोस्त
फ़ासले बहुतेरे हैं
दरियाओं से ही सिर्फ
समन्दर नहीं बनते
इन आँखों से भी बहे
सागर बहुतेरे हैं
आग से ही नही जले
आशियाने दुनिया में
शक ने भी  किये खाक
रिश्ते बहुतेरे हैं