क्या करें

क्या करें कि हमको भी
थोड़ी सी अक्ल आ जाये
उम्र के इस दौर में
हम भी थोड़ा संभल जायें
थोड़ा सा हँसे कम
और ज़रा सा मुस्कुराए
हर बात पर उछल कर
हम न बिफर जायें
ज़माने को बदलने की
इस जिद्द को थोड़ा बिसर जायें
वक्त की हालात की
संजीदगी हमको भी समझ आये
ए काश के हम जमाने से
थोड़ा सा तो डरें
और पालतू बन जायें

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आज भी

साँसों मे मेरी आज भी
खुशबू सा उतरता है
आँखों में इक ख्वाब है
जो नीन्दों मे मचलता है
सवेरे के धुन्घलके मे
तू धूप सा चमकता है
आज भी मेरी जुल्फों मे
फूलों सा महकता है
यादों के मोड़ पर
तू हँसी सा खनकता है
समन्दर में अहसासों के
तू सैलाब सा उमडता है
ए प्यार तू आज भी
न जाने क्यों मेरे सीने मे धड़कता है

खाँमखाँ

इस देश का साला क्या करू
जो हर साल पीछे ही खिसकता जाता है

मुस्तकबिल में इसके दिखता है धुआं
ये माज़ी की आग में ही सुलगता जाता है
हैवानियत हर चेहरे से रिसती सी है अब
इन्सानियत का रिश्ता जैसे खत्म हुआ जाता है
दुश्मन की इसको अब ज़रूरत क्या है
अपने ही चरागो से जो भस्म हुआ जाता है
इक और कत्लेआम की तैयारी में है मुल्क
सरहद पे कोई खाँमखाँ मरा जाता है ….