कल की आस

अंधेरा लगा है छटने
कल की आस झांकने
अब लगी है मन मे
सपने भी तैरने
लगे हैं आँखों मे
रंगों मे अहसास
कदमों में ताल
कानों मे गीत
मन में विश्वास
सब घर करने लगे हैं
अब जीवन में …

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मेरी याद

याद मेरी कभी तुम्हें आती नही क्या
कदमों की मेरे आहट कभी जगाती नही क्या
मेरा चेहरा आँख बंद करने पर कभी उभरता तो होगा
स्पर्श मेरा कहीं महसूस  होता नहीं क्या
साँसे मेरी  कानो मे खनकती नहीं क्या
दिल में कहीं दर्द उठता तो होगा
यादें मेरी चुपचाप अपना कोई कोना
तलाशती तो होंगी
रिश्ता जो था भी
और नही भी
कहीं अपनी परछाईं ढूंढता तो होगा

मन्थन

मन्थन तो होगा ही
अमृत भी निकलेगा
और विष भी
बस विषपान करने को
कोई नीलकंठ न होगा
थोड़ा थोड़ा हम सब को
ही विष चखना होगा
कुछ बौरायेंगे
कुछ बहकेंगे
संभलना भी होगा
संभालना भी स्वयं ही होगा
अमृत के प्रकट होने तक

अमावस के सितारे

अमावस की थी रात
न सूरज, न चाँद
किसी ने न दिया था साथ
सितारे जो दूर थे न दिखते थे दिनभर
उन्होंने ही है राह दिखाई शबभर
राहें रोशन तो न कर पाए ये तारे
पर दिशा दिखाते रहे रातभर ये सारे
जब टूट गया था हर साथ
ये ही तो थामें रहे थे हाथ
दूर से ही सही
मद्धम थी रोशनी
बस इक झिलमिलाहट ने
स्याह अन्धेरे को ललकारा था
कट न पाया अन्धेरा तो क्या
हौसला इन्होंने ही तो बंधाया था …