खाँमखाँ

इस देश का साला क्या करू
जो हर साल पीछे ही खिसकता जाता है

मुस्तकबिल में इसके दिखता है धुआं
ये माज़ी की आग में ही सुलगता जाता है
हैवानियत हर चेहरे से रिसती सी है अब
इन्सानियत का रिश्ता जैसे खत्म हुआ जाता है
दुश्मन की इसको अब ज़रूरत क्या है
अपने ही चरागो से जो भस्म हुआ जाता है
इक और कत्लेआम की तैयारी में है मुल्क
सरहद पे कोई खाँमखाँ मरा जाता है ….

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देख तो ले

तू देख ले साथ तेरा
छूट तो नही गया
हाथ से तेरे  हाथ किसी का
छूट तो नहीं गया
सारे रिश्ते निभाने में
कोई एक रिश्ता टूट
तो नहीं गया
तू देख तो ले इधर भी
कोई अकेला
खामोश सी आवाज़
देता ही गया

ईश्वर

तू बुद्ध तू प्रबुद्ध
मैं अहंकार
मूर्ख सतत विकार
तू व्याप्त अलौकिक प्रकाश
मै नश्वर बिन्दु समान
तू भीतर बाहर बहुआयाम
मैं जीवन मे बन्धा अज्ञानी अंधकार
तू कण तू बृहमा्न्ण
मै विस्मृत चकित पदार्थ
तू आकार तू निराकार
तू ही मेरे भीतर विद्यमान
शब्दों में नामों मे ॻन्थो मे
उलझा मै अन्भिग्य अभिमान
तू दयावान ईश्वर भगवान
करो कल्याण करो कल्याण

 

हिम्मत

ज़रूरत नही तलवार
या किसी हथियार की
हराने को तुम्हें
मेरी हिम्मत ही काफी है
मेरे बढते कदम से ही तुम
घबरा जाओगे
डराने को तुम्हें
मेरी रफ्तार ही काफी है
झूठ से दीवारें चिनाई हैं तुमने
नीव तुम्हारी दरकाने को
मेरी चिंघाड़ ही काफी है
डर के शोर से बहरी है
सेना तुम्हारी
रण छोड़ भगाने को
निशब्द प्रातिकार ही काफी है

 

दोस्त मेरे

गालियों से भी
उम्र मेरी बढ़ा
जाते हो तुम
याद आओ न आओ
भुलाए नही
जाते हो तुम
अमावस की रात के
जैसे सितारे हो तुम
काली हो जितनी रात उतना ही
तेज़ झिलमिलाते हो तुम
याद आओ न आओ
भुलाए नही जाते हो तुम