तुम राजनीति बहुत करते हो

गीता और कुरान में
तुम फूट डालने की
कोशिश करते हो
यार तुम
राजनीति बहुत करते हो
डरते हो हारने से
इसलिए तोड़ते हो लोगों को
बहादुर बनने की कोशिश
तो तुम बहुत करते हो
यार तुम
राजनीति बहुत करते हो
सदियों से न जाने कितने जिस्म
समा गए इस मिट्टी में
अब हर कतरे को
इस ख़ाक से अलग
करने की कोशिश करते हो
यार तुम
राजनीति बहुत करते हो
अन्धेरों को रहनुमा बनाते हो
रोशनी मे खुद से ही डरते हो
लफ्जों से सूरज को
ढकने की कोशिश करते हो
यार तुम
राजनीति बहुत करते हो

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चल पड़े हैं जब ज़ानिबे मंजिल
हमकदम मिले न मिले
राहे नक्शेकदम से गुलज़ार रहे
मंजिलें  मिले न मिले

भक्ति राग

मन्त्रमुग्ध तुम स्वयं पर
मस्त अपनी विजय पर
भूल धरातल को तुम
उड़ोगे ऊँचे आसमान में
खुद के ही शोर से
बहरे होते तुम
शब्द अब तर्क के
सुनाई तुम्हें देते नही
कर्णप्रिय लगते तुम्हें
केवल स्वयं के भक्ति राग
अपने ही गढे झूठ में
सही गलत से दूर तुम

 

भाई मेरे

मान था गुमान था
बहन होने पर तेरी
मुझे बड़ा अभिमान था
पर दुआओं मे मेरी
शिद्दत न थी
ड़ोरी मे मेरी कोई ताकत न थी
बाँध न सकी बचा न सकी
तुझे नियति से छुड़ा न सकी
साथ तेरा जो छूटा
भाई मेरे
बचपन से नाता है जैसे टूटा
हाथ पकड़ तेरा
लगाई थी जो दौड़
तेज़ उससे दौड़ न पाई आज तक कभी
मार खाई ,पलट कर मारा भी था तुझे
चुगली कर मार, माँ से खिलवाई भी थी तुझे
चेहरे पे तेरे शिकन न देख
शरम भी आई थी मुझे
दोस्त था तु भाई मेरा सबसे पहला
गिल्ली डण्डा तेरे साथ ही खेला था आखिरी
और पहला पहला
दौड़ती हूँ सपनों में आज भी
हाथ थाम कर तेरा
पर पहुंच पाती हूँ नहीं कहीं
आया भी था तू संग ले जाने मुझे
बंधन इस जहान के
छोड़ न पाये  थे मुझे
इक कतरा भी तेरे प्यार का अगर
तेरे बच्चों तक पहुंचा पाऊँ
आँखें उस जहान मे तुझसे
तब शायद मैं मिला पाऊँ

ये तो वह मंजिल न थी

ये तो वह जगह नहीं
ये तो वह मंजिल न थी
पहुंचे हैं हम आज जहां
ऐसी तो कभी ख्वाहिशें न थी
चले थे ख्वाब आँखों में लेके
बसायेंगे जहान सितारों से आगे
गर्दिशो ने राह की पकड़े जो कदम
उड़ तो न पाये पर सीधी सी राह पर
चलना भी है भूल गये हम
जीती थी आज़ादी
बड़ी जिद्दोजहद से कभी
आज खुद ही हुए हैं परेशान
इक दूजे की परवाज़ों से  हम
नहीं है ये वो तस्वीर
जिसकी ताबीर सज़ाई थी आँखों में
कहाँ चूक हुई, क्यों अपनों के ही
दुश्मन बन गए हैं हमp

तुम आ ही जाती हो

 

तुम आ ही जाती हो
कभी मेले में तो कभी अकेले मे
कभी चुपके से तो कभी रेले में
तुम आ ही जाती हो
कभी दरवाजे से तो कभी किसी कोने से
सुबह की धूप सी तो कभी अघजगी रातों से
तुम आ ही जाती हो
पुरानी धुन सी कभी
तो सावन में झूलों सी कभी
तुम आ ही जाती हो
आँखों की निपोरो मे कभी
हँसी की गुदगुदी में कभी
तुम आ ही जाती हो
बीते हुए लम्हों की यादें
तुम आ ही जाती हो

 

 

 

अच्छा होता है

भीड़ से पीछे रह जाना
भी कभी अच्छा होता है
हर रिश्ता खुशी ही दे
यह ज़रूरी तो नहीं
कुछ रिश्तों को राह
मे छोड़ जाना
भी कभी अच्छा होता है
हर आँख तुम्हें सही तौले
ये ज़रूरी तो नहीं
इन तराजू से दूर
खुद को कर पाना
भी कभी अच्छा होता है
भीड़ के संग बहक जाना
ये ज़रूरी तो नहीं
गलत हो कदम तो
पाँव को अपने थाम लेना
भी कभी अच्छा होता है