साँझी यादें

एक एक करके
जुदा हो गये सभी
संग ले गये अपने
वो यादें वो सपने
वो बचपन,वो अल्हडपन
जीवन का इक पन्ना हो गया सफेद
यादों की यादें भी बाकी न रही
कुरेदती हूँ सहेजती हूँ
पर कुछ होता हाँसिल नहीं
दिल का इक कोना
हो गया है खाली कहीं
सांझी यादों के
खो गयें है साथी सभी …

रुक तो सही ठहर जा ज़रा

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रुक तो सही
ठहर जा जरा
ए जिन्दगी
क्यों दौड़ती फिरती हैं
हर वक्त इस तरह
तेरा साथ देते देते
मै भी तो गई हूँ थक
साँस तो आने दे
सुस्ताने तो दे ज़रा
थकी हूँ, हारी नही हूँ
बस पल भर बैठी हूँ
तू भी आ बैठ मेरे संग
देख ज़रा
वो पहाड़ी से छिप कर तुझे
तकता वो सूरज
शर्म से हो रहा जो लाल
ये मदमस्त बयार
जो तुझे छूने से भी रही है डर
तेरी रफ्तार से हैं सब परेशान
आ साथ साथ मेरे
जरा इनसे भी ले तू मिल
फिर चलेंगे संग संग
समेटने तो दे ज़रा
मेरा बिखरा विश्वास
आने दे ज़रा
इन पैरों मे मेरे ताकत
झाड़ने तो दे तनिक
ये यादों के तिनके
लडखड़ाई हूँ, गिरी नहीं हूँ
संभलने तो दे ज़रा
फिर चलूँगी संग संग
मिलाकर तेरी रफ्तार से ताल….
ठहर तो ज़रा …

कल की आस

अंधेरा लगा है छटने
कल की आस झांकने
अब लगी है मन मे
सपने भी तैरने
लगे हैं आँखों मे
रंगों मे अहसास
कदमों में ताल
कानों मे गीत
मन में विश्वास
सब घर करने लगे हैं
अब जीवन में …

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मेरी याद

याद मेरी कभी तुम्हें आती नही क्या
कदमों की मेरे आहट कभी जगाती नही क्या
मेरा चेहरा आँख बंद करने पर कभी उभरता तो होगा
स्पर्श मेरा कहीं महसूस  होता नहीं क्या
साँसे मेरी  कानो मे खनकती नहीं क्या
दिल में कहीं दर्द उठता तो होगा
यादें मेरी चुपचाप अपना कोई कोना
तलाशती तो होंगी
रिश्ता जो था भी
और नही भी
कहीं अपनी परछाईं ढूंढता तो होगा

मन्थन

मन्थन तो होगा ही
अमृत भी निकलेगा
और विष भी
बस विषपान करने को
कोई नीलकंठ न होगा
थोड़ा थोड़ा हम सब को
ही विष चखना होगा
कुछ बौरायेंगे
कुछ बहकेंगे
संभलना भी होगा
संभालना भी स्वयं ही होगा
अमृत के प्रकट होने तक

अमावस के सितारे

अमावस की थी रात
न सूरज, न चाँद
किसी ने न दिया था साथ
सितारे जो दूर थे न दिखते थे दिनभर
उन्होंने ही है राह दिखाई शबभर
राहें रोशन तो न कर पाए ये तारे
पर दिशा दिखाते रहे रातभर ये सारे
जब टूट गया था हर साथ
ये ही तो थामें रहे थे हाथ
दूर से ही सही
मद्धम थी रोशनी
बस इक झिलमिलाहट ने
स्याह अन्धेरे को ललकारा था
कट न पाया अन्धेरा तो क्या
हौसला इन्होंने ही तो बंधाया था …

यादों के कारवाँ

बहुत कुछ रह गया अनकहा
बहुत कुछ छूट गया जहाँ का तहाँ
जाने वाले चले गये न जाने कहाँ
देकर हमें यादों का कारवाँ

स्त्री

हर दिन टूटती हूँ
हर दिन बिखरती हूँ
एक एक टुकड़ा समेटती हूँ हर दिन
सहेजती हूँ फिर से खड़ा करती हूँ खुद को
हर दिन
निरऩतर चलता रहता है प्रयास
जीवन बस प्रयत्न है अनन्त
एक नज़र एक शब्द से
बिखर जाता है पूरा प्रयास
मन का हर कोना हो जाता है छलनी
फिर पिरोती हूँ खुद को समय के धागों मे
स्त्री हूँ
हर दिन स्वयं को कर्मो के चक्र में
भूल जाती हूँ
उठना गिरना चलता है प्रतिदिन
हर दिन