हसरतें कभी मंज़िल न हुई

IMG_0879रातें मेरी जिंदगानी न हुई
बातें तेरी कहानी न हुई
फासलों के सिलसिले ही रहे
हसरतें कभी मंज़िल न हुई

दर्द की कद्रदानी न हुई
खुशियों की निगहबानी न हुई
लबों पे तंज़ अटके ही रहे
आँखों की हँसी से यारी न हुई

नींदो की खुमारी न हुई
सपनों की राजदारी न हुई
ख्वाब दहलीज़ पर ठिठके से रहे
सुबह की किसी को इन्तज़ारी न हुई

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2 विचार “हसरतें कभी मंज़िल न हुई&rdquo पर;

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