ये तो वह मंजिल न थी

ये तो वह जगह नहीं
ये तो वह मंजिल न थी
पहुंचे हैं हम आज जहां
ऐसी तो कभी ख्वाहिशें न थी
चले थे ख्वाब आँखों में लेके
बसायेंगे जहान सितारों से आगे
गर्दिशो ने राह की पकड़े जो कदम
उड़ तो न पाये पर सीधी सी राह पर
चलना भी है भूल गये हम
जीती थी आज़ादी
बड़ी जिद्दोजहद से कभी
आज खुद ही हुए हैं परेशान
इक दूजे की परवाज़ों से  हम
नहीं है ये वो तस्वीर
जिसकी ताबीर सज़ाई थी आँखों में
कहाँ चूक हुई, क्यों अपनों के ही
दुश्मन बन गए हैं हमp

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तुम आ ही जाती हो

 

तुम आ ही जाती हो
कभी मेले में तो कभी अकेले मे
कभी चुपके से तो कभी रेले में
तुम आ ही जाती हो
कभी दरवाजे से तो कभी किसी कोने से
सुबह की धूप सी तो कभी अघजगी रातों से
तुम आ ही जाती हो
पुरानी धुन सी कभी
तो सावन में झूलों सी कभी
तुम आ ही जाती हो
आँखों की निपोरो मे कभी
हँसी की गुदगुदी में कभी
तुम आ ही जाती हो
बीते हुए लम्हों की यादें
तुम आ ही जाती हो